बेसहारा गोवंश बनेगा शोध और स्वरोजगार की ताकत, पंत विवि में खुलेगा देश का आदर्श गोवंश विज्ञान केंद्र
पंतनगर। (लोक निर्णय)सड़कों पर बेसहारा घूमने वाला गोवंश अब समस्या नहीं, बल्कि शोध, रोजगार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की नई ताकत बनेगा। गोवंश संरक्षण को वैज्ञानिक अनुसंधान और संवर्धन से जोड़ते हुए पंत विवि में 65 एकड़ में भारत रत्न नानाजी देशमुख निराश्रित गोवंश संवर्धन एवं अनुसंधान केंद्र स्थापित किया जा रहा है। एक हजार गोवंश से शुरू होने वाला यह केंद्र भविष्य में पांच हजार गोवंश की क्षमता तक विकसित होगा। यहां निराश्रित पशुओं को आश्रय देने के साथ उनकी टैगिंग, स्वास्थ्य व प्रजनन प्रबंधन, देशी नस्लों के जीनोम संरक्षण और गोबर-गोमूत्र से मूल्यवर्धित उत्पादों पर शोध होगा। यानी सड़क पर भटकते गोवंश को ‘बोझ’ से ‘संसाधन’ में बदलने की दिशा में पंत विवि बड़ा प्रयोग करने जा रहा है।विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. शिवेंद्र कुमार कश्यप ने सोमवार को कुलपति सभागार में पत्रकारों को केंद्र से जुड़ी जानकारियां दीं । बताया कि केंद्र को देश का एक आदर्श गोवंश विज्ञान केंद्र बनाया जाएगा।उन्होंने केंद्र के संचालन के लिए शासी निकाय की घोषणा कर दी है। कुलपति स्वयं केंद्र के प्रकल्प सदस्य होंगे, जबकि डॉ. ब्रजेश सिंह को केंद्र का निदेशक बनाया गया है। पदेन सदस्यों में निदेशक शोध, मुख्य महाप्रबंधक फार्म तथा अधिष्ठाता, पशु चिकित्सा एवं पशुपालन विज्ञान महाविद्यालय शामिल होंगे। इसके अलावा विश्वविद्यालय के दस प्रोफेसरों को भी शासी निकाय में सदस्य बनाया गया है।कुलपति ने बताया कि केंद्र का उद्देश्य केवल निराश्रित गोवंश को आश्रय देना नहीं, बल्कि ‘संरक्षण से संवर्धन’ के सिद्धांत पर वैज्ञानिक ढंग से काम करना है। यहां गोवंश के लिए वैज्ञानिक आवास, संतुलित आहार, टीकाकरण, कृत्रिम गर्भाधान और स्वास्थ्य प्रबंधन की व्यवस्था की जाएगी। प्रत्येक पशु की टैगिंग कर उसका डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जाएगा, जिससे उसके स्वास्थ्य, उत्पादकता और प्रजनन से संबंधित जानकारी का वैज्ञानिक प्रबंधन संभव हो सकेगा।
केंद्र में निराश्रित गोवंश की उत्पादकता और प्रजनन क्षमता पर शोध के साथ देशी नस्लों के जीनोम संरक्षण पर भी काम होगा। इससे देशी गोवंश की आनुवंशिक संपदा के संरक्षण और वैज्ञानिक उपयोग को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।कुलपति डॉक्टर एसके कश्यप ने बताया कि
केंद्र में गोबर और गोमूत्र के उपयोग पर भी अनुसंधान किया जाएगा। इनके माध्यम से जैविक खाद, जीवामृत, घनजीवामृत, बायो-पेस्टीसाइड, बायोगैस और सीएनजी जैसे उत्पादों की संभावनाओं पर काम होगा। इसके साथ ही गोबर, गोमूत्र, दूध, दही और घी से विभिन्न औषधीय एवं मूल्यवर्धित उत्पाद विकसित करने के लिए अनुसंधान किया जाएगा।यह केंद्र शोध तक सीमित नहीं रहेगा। किसानों, युवाओं और स्वयं सहायता समूहों को गो आधारित प्राकृतिक खेती, गो उद्यमिता और पंचगव्य उत्पादन का प्रशिक्षण दिया जाएगा। इससे गोवंश आधारित छोटे उद्यमों को बढ़ावा देने और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार एवं स्वरोजगार मिलेगा।
बताया कि
उत्तराखंड समेत देश के कई हिस्सों में सड़कों पर घूमने वाला निराश्रित गोवंश फसल नुकसान और सड़क सुरक्षा की चुनौती बना हुआ है। दूध देना बंद करने के बाद पशुओं को बेसहारा छोड़ दिए जाने से यह समस्या और बढ़ती है। सड़क पर घूमने वाले गोवंश के कारण होने वाली दुर्घटनाओं में लोगों के घायल होने और जान जाने की घटनाएं भी सामने आती रही हैं।ऐसे में पंत विवि का यह केंद्र निराश्रित गोवंश को व्यवस्थित आश्रय देने के साथ-साथ उसके वैज्ञानिक प्रबंधन, स्वास्थ्य, प्रजनन, नस्ल संरक्षण और उत्पादक उपयोग पर एक साथ काम करेगा। इससे एक ओर किसानों की फसलों को होने वाले नुकसान को कम करने में मदद मिल सकती है, वहीं दूसरी ओर सड़क सुरक्षा से जुड़ी चुनौती के समाधान में भी योगदान की संभावना है।
पंत विवि की इस पहल का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि निराश्रित गोवंश को केवल आश्रय देने के बजाय उसे शोध, नस्ल संरक्षण, प्राकृतिक खेती, जैविक उत्पाद और ग्रामीण उद्यमिता से जोड़ने का प्रयास किया जाएगा। पांच हजार गोवंश की प्रस्तावित क्षमता के साथ विकसित होने पर यह केंद्र गोवंश प्रबंधन और उससे जुड़े अनुसंधान के लिए एक बड़ा संस्थागत मॉडल बन सकता है।केंद्र के निदेशक डॉक्टर ब्रजेश सिंह ने बताया कि
विश्वविद्यालय का यह प्रयास निराश्रित गोवंश की समस्या को केवल सामाजिक या पशु संरक्षण के मुद्दे के रूप में देखने के बजाय उसे कृषि, अनुसंधान, पर्यावरण, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सड़क सुरक्षा से जोड़कर समाधान तलाशने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।इस मौके पर शोध निदेशक डॉक्टर एसके वर्मा, मुख्य महाप्रबंधक फार्म डॉक्टर आरपी सिंह, निदेशक प्रसार डॉक्टर जेपी जायसवाल, डॉक्टर एसके नैन, डॉक्टर अरविंद त्यागी आदि मौजूद थे।





