न्यायिक मजिस्ट्रेट ने अवैध गोवंश परिवहन मामले में एफआइआर दर्ज करने के दिए आदेश
देहरादून : उत्तराखंड में पशु संरक्षण कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए देहरादून न्यायालय ने सहसपुर पुलिस को उत्तराखंड गोवंश संरक्षण अधिनियम, 2007 के अंतर्गत एफआइआर दर्ज कर आवश्यक जांच करने के निर्देश दिए हैं।यह आवेदन भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 175 के अंतर्गत दायर किया गया था, क्योंकि पुलिस द्वारा स्पष्ट रूप से संज्ञेय अपराध सामने आने के बावजूद एफआइआर दर्ज नहीं की गई थी।मामला दो फरवरी 2026 का है, जब धर्मावाला चौकी पुलिस ने खुशहालपुर, उत्तराखंड से सहारनपुर, उत्तर प्रदेश ले जाए जा रहे दो गायों और एक बछड़े को रोका था। आरोपियों द्वारा उत्तराखंड गोवंश संरक्षण अधिनियम, 2007 की धारा 6(1) के तहत आवश्यक वैधानिक अनुमति प्राप्त नहीं की गई थी, जबकि राज्य से बाहर किसी भी गाय या उसके बछड़े को ले जाने से पहले सक्षम प्राधिकारी से अनुमति लेना अनिवार्य है। इस संबंध में शिकायत पीपल फॉर एनिमल्स, उत्तराखंड की रूबीना नितिन अय्यर द्वारा दी गई थी।पशुओं को रोकने के बाद उन्हें सुरक्षा की दृष्टि से गौशाला में भेज दिया गया, किन्तु अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती होने के बावजूद पुलिस ने आरोपितों के विरुद्ध एफआइआर दर्ज नहीं की।इससे पूर्व, सेशन न्यायालय में चली कार्यवाही के दौरान न्यायालय ने बिना वैधानिक अनुमति के गोवंश को राज्य से बाहर ले जाने के मामले को गंभीरता से लिया था। न्यायालय ने पशुओं को मालिक के सुपुर्द करते समय 20,000 की राशि का बंधपत्र/अंडरटेकिंग लिया तथा स्पष्ट रूप से कहा था कि उत्तराखंड गोवंश संरक्षण अधिनियम, 2007 के तहत विधिक अनुमति के बिना गोवंश को राज्य से बाहर ले जाना कानून का उल्लंघन है। न्यायालय ने भविष्य में बिना अनुमति गोवंश परिवहन न करने के निर्देश भी दिए थे।इसके बावजूद पुलिस द्वारा कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया गया, जिसके बाद शिकायतकर्ता को न्यायालय की शरण लेनी पड़ी और धारा 175 BNSS के अंतर्गत याचिका दायर कर न्यायिक हस्तक्षेप की मांग करनी पड़ी।देहरादून न्यायालय ने मामले का संज्ञान लेते हुए अब पुलिस को एफआइआर दर्ज करने का आदेश दिया है तथा कहा है कि मामला संज्ञेय अपराध का है और विधि अनुसार आवश्यक जांच की जानी चाहिए।याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि पुलिस अधिकारियों ने मोटर वाहन अधिनियम तथा पशु क्रूरता निवारण अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत भी उचित कार्रवाई नहीं की, जबकि पशुओं को अवैध एवं अमानवीय परिस्थितियों में परिवहन किया जा रहा था।“आज का आदेश उत्तराखंड में पशु संरक्षण कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि जब कोई संज्ञेय अपराध सामने आता है, तब पुलिस मूकदर्शक नहीं बनी रह सकती। यह मामला प्रवर्तन एजेंसियों को उत्तराखंड गोवंश संरक्षण अधिनियम एवं पशु कल्याण कानूनों के प्रति संवेदनशील और प्रशिक्षित करने की आवश्यकता को भी उजागर करता है” रूबीना नितिन अय्यर ने कहा।यह आदेश अवैध अंतरराज्यीय गोवंश परिवहन के विरुद्ध सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है तथा यह संदेश देता है कि पशु संरक्षण कानूनों को अब गंभीरता से लागू किया जाएगा।





