चिकित्सक भगवान किसके लिए भगवान हैं?/ डॉक्टर किसके लिए भगवान हैं?
रुद्रपुर। (लोक निर्णय न्यूज)आज इस विषय पर चर्चा करना बहुत आवश्यक हो गया है, जब से मेडिकल केयर पूरी तरह से निर्धारित हो गया है। इसलिए इसका मतलब बदल दिया गया है। कंपनी या कॉर्पोरेट जगत में निवेश करते हैं और फिर मरीजों से पैसा वसूलते हैं। यूनिट को इस बड़ी में दूसरी बड़ी की तुलना में अधिक सुरक्षित महसूस होता है, क्योंकि रोगी अपने स्वास्थ्य, या अपने जीवन की रक्षा के लिए कहीं न कहीं से न कहीं से मदद जरूर लेते हैं। इस दवा में डॉक्टर की सबसे अहम भूमिका शामिल हैं। उसी के माध्यम से धन संचयन संभव होता है। मरीज़ सबसे पहले डॉक्टर से मिलते हैं। मनोवैज्ञानिक पर यदि वह किसी व्यवसायी के साथ काम करता है, तो उस पर मनोवैज्ञानिक दबाव महसूस होता है। अपने कर्तव्य के अलावा, वह उद्यमी के बारे में भी विचार रखता है। बिजनेसमैन को इस बात से कोई मतलब नहीं है कि आप अपने बिजनेसमैन को सही सलाह और देखभाल दें।इन्वेस्टर हॉस्पिटल ने फाइव-स्टार को होटल के रूप में बनाया है, जिसमें सभी मरीज़, पर्सनल और मेडिकल स्टाफ, और अन्य स्टाफ़ प्रोग्राम जॉब हॉस्पिटल से जुड़े हुए हैं। उनका वेतन भी समय पर देना होता है। अस्पताल से जुड़े सभी उपकरण और आवश्यक खर्च पूरे हो जाते हैं, और निवेश बढ़ाने के लिए नए-नए तरीके ढूंढे जाते हैं। निवेशक लाभ के लिए लगन, कड़ी मेहनत और ईमानदारी से अपना काम करते हैं (यहां विश्वसनीयता शब्द का मतलब पैसे वाली कड़ी मेहनत से है) । आख़िरकार, सारा माल बाज़ार पर ही सामान है, और कीमत ग्राहकों को चुकानी पड़ती है।अब निवेशकों की भूमिका में डॉक्टर, पैथोलॉजिस्ट, डायग्नोस्टिक्स और फार्मेसी के भगवान है। अब तक हमने सुना था कि चिकित्सक भगवान होते हैं लेकिन आज के समय में यह कहना गलत नहीं होगा कि चिकित्सक निवेशकों के भी भगवान ही हैं। समय काफी बदल गया है। सरकार गरीबों को मुफ्त मेडिकल केयर देने के लिए कई योजनाएं व नीतियां लागू कर रही है।कुछ बीमा कंपनियां भी यह पक्का करने के लिए कई तरह के प्रलोभन देती हैं। जिससे मरीजों को सही फायदा मिले। इसलिए यहां मरीजों के साथ बीमा कंपनियां बिजनेस के तौर पर खेल खेल रही हैं। यहां हर किसी के खेलने का उद्देश्य लोगों को स्वास्थ्य देना है। इतने सारे व्यवसाय को एक साथ, एक छत के नीचे लाने के बाद भी स्वास्थ्य जन मानस से अभी भी काफी दूर है। बीमा कंपनियां भी व्यवसाय में हैं और उन्हें भी व्यवसाय की सभी शर्ते माननी पड़ती हैं।जो एक सामान्य व्यवसाय पर लागू होते हैं। मुझे समझ आता है, इस स्थिति के दो मुख्य कारण चिकित्सकों को अतिरिक्त आर्थिक लाभ का प्रलोभन और अस्पतालों में मरीजों और उनके तीमारदारों को अतिरिक्त एवं अत्यधिक सुविधाएं देने की कोशिशें। आज के मरीजों को अस्पतालों में होटल जैसी शानदार सुविधाओं की जरूरत होती है। इसलिए, अस्पताल में रहने का खर्च अक्सर इलाज से अधिक होता है। और आज के अमीर और संतुष्ट मरीज़ इसके लिए कुछ हद तक जिम्मेदार हैं। इसका फ़ायदा उठाकर जिम्मेदारों गैर, जिम्मेदा बन गए हैं और सभी व्यवसायों के भगवान बन गए हैं।चिकित्सकों की भूमिका दो पाटों के बीच की है। लाभ से से ज्यादा जिम्मेदारी और बदनामी होती है। तभी तो आज के सिनेमा भी चिकित्सा एवं ग्राहकों पर हावी रहते हैं।इस विषय पर सभी का ध्यान तो है, लेकिन उसका नजरिया अलग-अलग है।अभिभावक सोचते हैं कि व्यवसाय अच्छा है ।किसी भी कीमत पर अपने बच्चे को एमबीबीएस की पढ़ाई कराकर डॉक्टर ही बनाना है। उस की कीमत की वजह से आज कोटा जैसे शहर और वहां की बढ़ती आत्महत्याएं और मनमाने प्राइवेट मेडिकल कॉलेज आज के चलन में हैं। पत्रकारिता यदि इस विषय पर गंभीर हो तो शायद समाज में नए चलन का शुभारंभ हो। चलती चाकी देख कर दिया कबीरा रोए,दो पाटों के बीच में साबुत बचा न कोय।
डॉ. हेमंत सिंह चौहान (होम्योपैथिक) रुद्रपुर





