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दून पुस्तकालय में दादी का रेडियो और ठहरे किनारे पुस्तक का हुआ लोकार्पण

देहरादून।(लोक निर्णय)सोमवार को दून पुस्तकालय देहरादून में रचनाकार ज्योत्स्ना जोशी की दो पुस्तकों ‘दादी का रेडियो’ (संस्मरण) और ‘ठहरे किनारे’ (काव्य संग्रह) का लोकार्पण हुआ। कार्यक्रम में देहरादून के वरिष्ठ साहित्यकारों, लेखकों, कवियों, शिक्षाविदों और समाजकर्मियों ने प्रतिभाग किया।कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ कथाकार मुकेश नौटियाल ने की। मुख्य वक्ता के रूप में शिक्षाविद डॉ. उमा भट्ट, साहित्यकार डॉ. सुरेंद्र दत्त सेमल्टी और सामाजिक कार्यकर्ता कुलदीप रावत ने दोनों पुस्तकों पर अपने विचार व्यक्त किए।रचनाकार ज्योत्स्ना जोशी ने अपनी रचना प्रक्रिया तथा पुस्तकों से जुड़े अनुभव साझा किए।कार्यक्रम का शुभारंभ लेखिका की कविताओं के पाठ से हुआ, जिसे कान्ता घिल्डियाल और मधुरवादिनी तिवारी ने भावपूर्ण अंदाज में प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का संचालन निक्की पुष्कर ने किया।वरिष्ठ कथाकार मुकेश नौटियाल ने कहा कि ‘दादी का रेडियो’ केवल संस्मरण नहीं, बल्कि पहाड़ के विस्थापन और स्मृति के बीच का सेतु है। उन्होंने कहा कि लेखिका ने ‘गाँव की सुबह’ के माध्यम से खाली गागर की खनखनाहट, पंदेरे में पानी भरने जाती महिलाओं की खिलखिलाहट, सट्टी कूटने की आवाज और बोडा जी के मंत्रोच्चारण जैसी स्मृतियों को जिस जीवंतता से दर्ज किया है, वह उत्तराखंड के लोकजीवन को साहित्य में पुनर्जीवित करने का कार्य है।शिक्षाविद डॉ. उमा भट्ट ने कहा कि ‘दादी का रेडियो’ में दो पीढ़ियों का संवाद दिखाई देता है। दादी द्वारा प्यार और डांट के साथ पोती को जगाने और लेखिका द्वारा कच्ची नींद में करवट बदलते हुए पूरे गांव की ध्वनियों को सुनने का प्रसंग हर पहाड़ी घर की आत्मीय कहानी को सामने लाता है। उन्होंने कहा कि पुस्तक पहाड़ के जीवन, प्रकृति और पारिवारिक स्मृतियों को बेहद संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करती है।डॉ. सुरेंद्र दत्त सेमल्टी ने ‘ठहरे किनारे’ काव्य संग्रह पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि ठहराव भी एक गति है। उन्होंने कहा कि झील के किनारे बैठी स्त्री की तरह इस संग्रह की कविताएं जीवन के ठहरे हुए क्षणों में गहराई से उतरती हैं। सामाजिक कार्यकर्ता कुलदीप रावत ने कहा कि ऐसी रचनाएं नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ज्योत्स्ना जोशी ने अपने गांव और बचपन की स्मृतियों को साझा करते हुए कहा कि उनका गांव रुद्रप्रयाग जिले में तिलवाड़ा से लगभग तीन किलोमीटर पैदल दूरी पर एक गहरी समतल जगह पर स्थित है, जो चारों ओर से पहाड़ों से घिरी हुई है। उन्होंने अपने बचपन को याद करते हुए कहा कि वह उनके जीवन का अनमोल और अविस्मरणीय अल्हड़ दौर था, जब सूरज की किरणें मानो पलकों में रखकर जगाती थीं। उन्होंने दादी के साथ जुड़ी कई आत्मीय स्मृतियां भी साझा कीं। उनके संस्मरणों पर सभागार में उपस्थित लोगों ने तालियों से उनका उत्साहवर्धन किया।समारोह में उपस्थित साहित्यकारों और रचनाकारों ने दोनों पुस्तकों को पहाड़ी जीवन, लोक-स्मृति और स्त्री-संवेदना को अभिव्यक्त करने वाली महत्वपूर्ण साहित्यिक कृतियां बताया। कार्यक्रम में दून घाटी के अनेक वरिष्ठ एवं युवा साहित्यकार, लेखक और कवि उपस्थित रहे।इस अवसर पर अतुल शर्मा, अरुण कुकसाल, मदन डुकलाण, रमाकांत बेंजवाल, बीना बेंजवाल, जेपी मैठाणी, डॉ. लालता प्रसाद, गीता गैरोला, एसके नौटियाल, देवेंद्र कांडपाल, एस. नैथानी, सारिका सूरी, चंद्र शेखर तिवारी, रमा शर्मा, मनोज इस्टवाल, सुरेंद्र सजवाण सहित अनेक साहित्यप्रेमी उपस्थित थे। अंत में समय साक्ष्य प्रकाशन की ओर से सभी अतिथियों एवं उपस्थित साहित्यकारों का आभार व्यक्त किया गया।

locnirnay@gmail.com

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