साहित्य, सिनेमा और संस्कृति का संगम
देहरादून।दून पुस्तक महोत्सव में सुप्रसिद्ध फिल्म निर्देशक इम्तियाज अली का विशेष सत्र आकर्षण का केंद्र रहा।जहां उन्होंने अपने अनुभवों और रचनात्मक यात्रा के विविध पहलुओं को साझा किया। इम्तियाज अली ने अपने बचपन से जुड़े कई दिलचस्प किस्से साझा करते हुए बताया कि वे बचपन में छिप-छिपकर फिल्में देखा करते थे। उन्होंने अपनी चर्चित फिल्म ‘रॉकस्टार’ और कश्मीर में फिल्मांकन के अनुभवों को याद करते हुए कहा कि “कश्मीर में शूटिंग का अनुभव बेहद खास और यादगार रहा।” रेल यात्रा के प्रति अपने लगाव का भी जिक्र किया। साथ ही, फिल्म ‘धुरंधर’ पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा, “लोगों ने एक बार फिर सिनेमाघरों का रुख करना शुरू कर दिया है और अब लंबी अवधि की फिल्मों को भी दर्शकों द्वारा स्वीकार किया जा रहा है।” साथ ही, कर्नल आरएस सिद्धू और ब्रिगेडियर सुयश शर्मा ने भी अपने संवाद के माध्यम से उपस्थित दर्शकों से सार्थक चर्चा की। इन सभी सत्रों ने न केवल श्रोताओं को नई दृष्टि प्रदान की, बल्कि महोत्सव के बौद्धिक और सांस्कृतिक वातावरण को और अधिक समृद्ध किया।चिल्ड्रन्स कॉर्नर माहौल उत्साह, रचनात्मकता और खुशी से भरा रहा। दिन की शुरुआत “एक्ट इट आउट” सत्र से हुई, जिसमें आस्था और तस्नीम ने “मीठा और मीठी” नाम की दो मधुमक्खियों की कहानी को अभिनय के जरिए बच्चों के सामने जीवंत कर दिया। इसके बाद फारमान और मुस्कान के “क्लाउनिंग वर्कशॉप” में बच्चों ने मजेदार अंदाज में अलग-अलग क्लाउन किरदार बनाकर खूब हंसी-मजाक किया। “कम्युनिकेशन स्किल्स वर्कशॉप” में अभा मैसी ने बच्चों को अच्छे से बोलने और अपनी बात आत्मविश्वास के साथ रखने के आसान तरीके सिखाए। वक्ताओं ने विज्ञान और तकनीकी विषयों के अनुवाद में आने वाली वास्तविक शब्द-चयन की कठिनाइयों को भी रेखांकित किया। विशेषज्ञों का मानना था कि आंचलिक भाषाओं को पाठकों तक पहुँचाने में अनुवाद एक सशक्त माध्यम है, किंतु कई प्रभावी शब्दों के लिए सटीक विकल्प न मिलना और ए-आई (AI) आधारित अनुवाद की सीमित संवेदनशीलता जैसे पक्ष इस विधा को और अधिक शोध की माँग करने वाला बनाते हैं। अंततः, सत्र में इस बात पर सहमति बनी कि सफल अनुवाद के लिए शब्दों की तकनीकी शुद्धता और आंचलिक भावों की मौलिकता के बीच संतुलन अनिवार्य है।दून पुस्तक महोत्सव के भव्य सांस्कृतिक सत्र में ‘रहनुमा लाइव’ बैंड ने अपनी ऊर्जावान और रूहानी प्रस्तुति से समां बांध दिया। परेड ग्राउंड में राजस्थान के थार रेगिस्तान की समृद्ध विरासत और आधुनिक संगीत का अद्भुत संगम देखने को मिला, जहाँ बाड़मेर और जैसलमेर से आए पारंपरिक ‘मांगणियार’ कलाकारों ने अपनी खड़ताल और कमायचा की गूँज से दर्शकों को राजस्थानी लोक संस्कृति के मंत्रमुग्ध कर देने वाले सफर पर पहुँचा दिया।





