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युवा तकनीक को साधन बनाए,साध्य नहीं

पंतनगर।जब परंपरा की स्मृतियां आधुनिक तकनीक की भाषा से संवाद करती हैं, तब केवल विचार नहीं, दिशा जन्म लेती है। इसी भाव के साथ मंथनः 21वीं राष्ट्रीय युवा संगोष्ठी ने आज गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, पंतनगर में युवाओं को एक ऐसा मंच दिया।जहां अतीत की समझ और भविष्य की कल्पना एक-दूसरे से जुड़ती चली गई। देश के विभिन्न प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से आए विद्यार्थियों ने इस वैचारिक यात्रा में सक्रिय सहभागिता की।
सम्मेलन में विभिन्न विषयों पर चर्चाओं, शोध प्रस्तुतियों और अनौपचारिक संवादों के माध्यम से यह स्पष्ट होता गया कि मंथन युवाओं के लिए आत्मचिंतन और दिशा-निर्धारण का अवसर भी था। संगोष्ठी का केन्द्रीय विचारकृ
“सांस्कृतिक जड़ें और डिजिटल शक्तिः तकनीकी नवाचारों के साथ सांस्कृतिक सशक्तिकरण एवं राष्ट्र निर्माण के लिए युवाओं का मार्गदर्शन”पूरे आयोजन में निरंतर प्रतिध्वनित होता रहा। यह विचार हर सत्र, हर प्रस्तुति और हर संवाद में किसी न किसी रूप में सामने आता रहा।चिंतन की गहराई और दृष्टि की व्यापकता स्पष्ट दिखाई दी।
प्रस्तुतियों के दौरान यह भी देखने को मिला कि युवा शोधार्थी केवल सैद्धांतिक चर्चा तक सीमित नहीं थे, बल्कि उन्होंने अपने विषयों को समाज, नीति और व्यवहारिक जीवन से जोड़कर प्रस्तुत किया। इस अवसर पर स्वामी आत्मश्रद्धानंद ने कहा कि युवा अवस्था केवल आयु का चरण नहीं, बल्कि संभावनाओं, प्रयोगों और आत्म-खोज का काल है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे डिजिटल युग की सुविधाओं का उपयोग विवेक, संयम और उद्देश्य के साथ करें। स्वामी जी ने यह भी कहा कि भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिकता युवाओं को आंतरिक शक्ति और नैतिक दिशा प्रदान करती है, जो उन्हें भटकाव से बचाती है। उन्होंने बल दिया कि विवेकानंद के आदर्श आज भी युवाओं को आत्मनिर्भर, चरित्रवान और राष्ट्रसेवा के लिए समर्पित नागरिक बनने की प्रेरणा देते हैं। अंत में उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे तकनीक को साधन बनाएं, साध्य नहीं, और अपने जीवन को सेवा व चरित्र से आलोकित करें।भारतीय ज्ञान परंपरा से आधुनिक स्वास्थ्य दृष्टिकोण इस उप-विषय के अंतर्गत जीवनशैली, पारंपरिक चिकित्सा और आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों के बीच एक स्वाभाविक सेतु उभरता दिखाई दिया। प्रस्तुतियों में स्वास्थ्य को केवल उपचार नहीं, बल्कि संतुलित और सजग जीवन की प्रक्रिया के रूप में समझा गया। वक्ताओं ने यह दर्शाया कि भारतीय ज्ञान परंपरा में निहित स्वास्थ्य दृष्टि आज की तेज रफ्तार जीवनशैली के लिए भी उतनी ही प्रासंगिक है।रामकृष्ण मिशन से जुड़े सम्मानित अतिथि स्वामी आत्मश्रद्धानंद ने कहा कि स्वास्थ्य-सेवा के क्षेत्र में तकनीकी प्रगति तभी वास्तविक अर्थ प्राप्त करती है, जब वह भारत की शाश्वत सांस्कृतिक और वैज्ञानिक विरासत से जुड़ी रहती है .सत्र के दौरान यह भावना उभरी कि तकनीकी नवाचार तब अधिक सार्थक बनते हैं, जब वे मनुष्य की संपूर्ण भलाई को केंद्र में रखकर विकसित किए जाएं।
पारंपरिक कृषि से हाईटेक कृषि की ओर इस सत्र में खेतों की मिट्टी और प्रयोगशालाओं की तकनीक एक साथ चलती नजर आई। वक्ताओं ने स्थानीय कृषि अनुभवों और आधुनिक नवाचारों को जोड़ते हुए ऐसे मॉडल सामने रखे, जो भविष्य की खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण सशक्तिकरण की दिशा संकेत करते हैं। चर्चाओं में यह स्पष्ट हुआ कि कृषि केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत और आत्मनिर्भरता का आधार भी है।
इस विषय पर डॉ. प्रतीक शर्मा ने कहा कि जब तक जैविक खेती के लिए मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र, बाजार और नीतिगत समर्थन नहीं बनाया जाता, तब तक इसका व्यापक क्रियान्वयन संभव नहीं है। उन्होंने जोर दिया कि टिकाऊ कृषि और पोषण सुरक्षा के लिए व्यवस्थित, वैज्ञानिक और सहयोगात्मक मॉडल अपनाना समय की मांग है।गुरुकुल परंपरा से ई-लर्निंग तक शिक्षा का विस्तार शिक्षा पर केंद्रित इस उप-विषय में गुरुकुल की भावना और डिजिटल मंचों की संभावनाएँ एक ही धारा में बहती दिखीं। प्रस्तुतियों ने यह दर्शाया कि तकनीक तब अधिक प्रभावी बनती है, जब वह संस्कृति, मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं से जुड़ती है। वक्ताओं ने शिक्षा को केवल कौशल अर्जन का माध्यम नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़कर देखा। हार्दिक मेहता ने कहा कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल ज्ञान का प्रसारण नहीं, बल्कि तकनीक के माध्यम से संस्कार, सोच और सांस्कृतिक चेतना का विकास करना होना चाहिए।
पारंपरिक जीवनशैली से आधुनिक पर्यावरण समाधान इस सत्र में प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की भारतीय दृष्टि और आधुनिक स्मार्ट समाधानों का सहज संगम देखने को मिला। वक्ताओं ने पारंपरिक जीवन मूल्यों को आज की पर्यावरणीय चुनौतियों के संदर्भ में प्रासंगिक रूप में प्रस्तुत किया। चर्चाओं में यह बात उभरकर सामने आई कि जलवायु संकट के समाधान केवल तकनीकी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक दृष्टिकोण में भी निहित है . रामानुज मिश्रा, निदेशक, करियर लॉन्चर ने कहा कि वर्तमान समय की आवश्यकता है कि पारंपरिक सतत तकनीकों को आधुनिक प्रथाओं के साथ एकीकृत किया जाए।जिससे एक प्रभावी और संतुलित प्रणाली विकसित की जा सके।सम्मेलन से प्राप्त निम्नलिखित अनुशंसाओं में स्पष्ट रूप से देखने को मिलती है किभारत विश्व की डिजिटल राजधानी बनने की दिशा में निरंतर अग्रसर है। डिजिटल महाशक्ति बनने की दिशा में युवाओं का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिससे व्यापक स्तर पर डिजिटल अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन मिल सके।
इस दिशा में सरकारी नीतियाँ भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, क्योंकि वे नवाचार, डिजिटल अवसंरचना और युवाओं की भागीदारी के लिए अनुकूल वातावरण का निर्माण करती हैं।आवश्यकता इस बात की है कि डिजिटल सामग्री के निर्माण की प्रक्रिया का संस्थागतकरण किया जाए, जिससे इसकी गुणवत्ता, विश्वसनीयता और व्यापक पहुँच सुनिश्चित हो सके। भारतीय ज्ञान परंपरा को बढ़ावा दिया जाना आवश्यक है, ताकि जीवनशैली में सकारात्मक और मूल्य-आधारित सुधार लाया जा सके। जहाँ भारत में नैनो-प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में बड़े नवाचार सामने आए हैं, वहीं प्राचीन ग्रंथों और पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण एवं संवर्धन भी उतना ही आवश्यक है। डिजिटल माध्यमों को शिक्षा, स्वास्थ्य एवं कौशल विकास जैसे क्षेत्रों में समाहित कर डिजिटल क्रांति की दिशा में ठोस कदम बढ़ाए जाने चाहिए।भारत केवल एक रूढ़िवादी राष्ट्र नहीं, बल्कि विश्व के साथ कदम से कदम मिलाकर चलते हुए, अपने सशक्त नैतिक मूल्यों और पारंपरिक जड़ों पर आधारित होकर प्रगति की ओर अग्रसर है।मंथन एक ऐसा अनुभव बनकर उभरा, जहाँ आधुनिकता को अपनाने में सांस्कृतिक पहचान बाधा नहीं, बल्कि आधार के रूप में सामने आई। युवाओं ने यह महसूस किया कि अपनी परंपराओं को समझना उन्हें पीछे नहीं, बल्कि आगे बढ़ने की स्पष्ट दिशा देता है।प्राकृतिक चिकित्सा (नैचुरोपैथी) उपविषय में गोविंद बल्लभ पंत विश्वविद्यालय के ऋषभ सरवाल, आकृति बल्लभ और प्रबल कुमार सक्सेना ने सर्वश्रेष्ठ शोध पत्र पुरस्कार प्राप्त किया।कृषि विषय में गोविंद बल्लभ पंत विश्वविद्यालय की अनुष्का ध्यानी, यशस्विनी खाती और सार्थक जोशी को सर्वश्रेष्ठ शोध पत्र के लिए सम्मानित किया गया।तीसरे, शिक्षा उपविषय मेंvआईसीएआरदृआईएआरआई, दिल्ली के पी. जोशी, गिरिजेश सिंह महरा, यशस्वी भारद्वाज और अंश ने सर्वश्रेष्ठ शोध पत्र पुरस्कार जीता। पारिस्थितिकी ।उपविषय में गोविंद बल्लभ पंत विश्वविद्यालय के कनक पाल, सगुन बोहरा और अदिति बिष्ट को सर्वश्रेष्ठ शोध पत्र पुरस्कार प्रदान किया गया।पुरस्कार वितरण ने प्रतिभागियों के आत्मविश्वास को और मजबूत किया तथा उन्हें भविष्य में और गहन शोध व सामाजिक योगदान के लिए प्रेरित किया। गहन वैचारिक विमर्श से भरे इन सत्रों के बाद लोहड़ी पर्व ने वातावरण को एक आत्मीय विराम दिया। पारंपरिक उल्लास और सामूहिक सहभागिता के बीच मनाया गया यह पर्व थके हुए मन को तरोताजा करता हुआ सभी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से फिर एक बार जोड़ गया, और मंथन 2026 को एक स्मरणीय, संतुलित और भावनात्मक समापन मिला।

locnirnay@gmail.com

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