दीदी की लाइब्रेरी बनी बदलाव की मिसाल: महिलाओं को मिली आजीविका, युवाओं के सपनों को मिला नया आसमान
खटीमा। (लोक निर्णय) उत्तराखंड के ऊधम सिंह नगर जनपद के विकासखण्ड खटीमा में कन्हैया महिला सहकारिता द्वारा संचालित “दीदी की लाइब्रेरी” आज ग्रामीण शिक्षा, महिला उद्यमिता और सामुदायिक विकास का प्रेरणादायी मॉडल बनकर उभरी है। यह पुस्तकालय केवल पढ़ाई का केंद्र नहीं, बल्कि महिलाओं की आत्मनिर्भरता और युवाओं के उज्ज्वल भविष्य की नई पहचान बन चुका है।ग्रामीण क्षेत्र के अनेक विद्यार्थी प्रतियोगी परीक्षाओं, बोर्ड परीक्षाओं एवं उच्च शिक्षा की तैयारी के लिए शांत एवं गुणवत्तापूर्ण अध्ययन वातावरण की तलाश में थे। निजी पुस्तकालयों की सीमित उपलब्धता और अधिक खर्च के कारण आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के विद्यार्थियों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। वहीं स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं ऐसा स्थायी उद्यम स्थापित करना चाहती थीं, जो उन्हें नियमित आय के साथ समाज में नई पहचान भी दिला सके।इन्हीं आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए IFAD-वित्तपोषित ग्रामोत्थान (REAP) परियोजना के सहयोग से सीबीओ स्तर के गैर-कृषि आधारित उद्यम के रूप में “दीदी की लाइब्रेरी” की स्थापना की गई। इस अभिनव पहल का उद्देश्य शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और सामुदायिक विकास को एक मंच पर लाना था।
पुस्तकालय की स्थापना के लिए ग्रामोत्थान (REAP) परियोजना द्वारा छह लाख रुपये की वित्तीय सहायता, जिला सहकारी बैंक, खटीमा से ₹3 लाख का बैंक ऋण तथा कन्हैया महिला क्लस्टर स्तरीय स्वयं सहायता सहकारिता द्वारा 1 लाख रुपये का स्वयं का निवेश किया गया। इसके अतिरिक्त राज्य वित्त एवं CSR के अभिसरण से भी संसाधन उपलब्ध कराए गए। खण्ड विकास कार्यालय, खटीमा परिसर में भवन उपलब्ध कराकर इसे आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित किया गया।
निर्माण कार्य पूर्ण होने के बाद 25 मई 2026 को उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने “दीदी की लाइब्रेरी” का लोकार्पण किया। जून 2026 से नियमित संचालन शुरू होते ही यह पुस्तकालय क्षेत्र के विद्यार्थियों के बीच लोकप्रिय अध्ययन केंद्र बन गया।वर्तमान में पुस्तकालय में वातानुकूलित अध्ययन कक्ष, शांत एवं स्वच्छ वातावरण, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों के लिए अलग रीडिंग जोन तथा स्कूल और कॉलेज के विद्यार्थियों के लिए बेहतर बैठने की व्यवस्था उपलब्ध है। इससे विद्यार्थियों को अपने ही विकासखण्ड में गुणवत्तापूर्ण अध्ययन का अवसर मिला है, जिससे समय और आर्थिक व्यय दोनों में कमी आई है।इस पहल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि पुस्तकालय का संचालन पूरी तरह स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं कर रही हैं। सदस्यता प्रबंधन, अभिलेख संधारण, वित्तीय संचालन और दैनिक व्यवस्थाओं का सफल संचालन महिलाओं द्वारा किया जा रहा है। इससे उनमें नेतृत्व क्षमता, आत्मविश्वास और उद्यमिता का उल्लेखनीय विकास हुआ है तथा उन्हें सम्मानजनक और नियमित आय का नया माध्यम मिला है।परियोजना के सकारात्मक परिणाम भी सामने आने लगे हैं। संचालन शुरू होने के केवल दो माह (जून-जुलाई 2026) में ही पुस्तकालय ने 32,020 रुपये की आय अर्जित की, जिसमें 16,580 रुपये का शुद्ध लाभ प्राप्त हुआ। वर्तमान में लगभग 50 विद्यार्थी नियमित रूप से यहां अध्ययन कर रहे हैं। यह उपलब्धि दर्शाती है कि सामाजिक उद्देश्य से शुरू किया गया यह सामुदायिक उद्यम आर्थिक रूप से भी सफल साबित हो रहा है।”दीदी की लाइब्रेरी” ने क्षेत्र में शिक्षा के प्रति सकारात्मक माहौल तैयार किया है। अभिभावकों का विश्वास बढ़ा है, विद्यार्थियों में नियमित अध्ययन की संस्कृति विकसित हुई है और महिलाओं को सम्मानजनक आजीविका के साथ समाज में नई पहचान मिली है। यह मॉडल साबित करता है कि जब शिक्षा और आजीविका को एक साथ जोड़ा जाता है, तो उसका लाभ पूरे समुदाय तक पहुंचता है।
इस सफलता के पीछे IFAD-वित्तपोषित ग्रामोत्थान (REAP) परियोजना, जिला परियोजना प्रबंधन इकाई, मुख्य विकास अधिकारी, खण्ड विकास अधिकारी तथा संबंधित विभागों का सतत मार्गदर्शन और समन्वित सहयोग रहा है।आज “दीदी की लाइब्रेरी” केवल एक पुस्तकालय नहीं, बल्कि महिला नेतृत्व, सामुदायिक सहभागिता और आत्मनिर्भर उत्तराखण्ड की सशक्त मिसाल बन चुकी है। यह पहल इस बात का प्रमाण है कि यदि महिलाओं को अवसर, संसाधन और संस्थागत सहयोग मिले तो वे न केवल अपनी आजीविका सशक्त बना सकती हैं, बल्कि पूरे समाज के विकास की नई इबारत भी लिख सकती हैं।





