प्रकाशित खबरों पर केडीएफ अध्यक्ष ने दी सफाई
काशीपुर। केडीएफ के अध्यक्ष राजीव घई ने कहा कि तीर्थ द्रोण सागर केवल एक जलस्रोत नहीं, बल्कि हमारी पौराणिक परंपरा, सनातन संस्कृति और ऐतिहासिक विरासत का प्रतीक है। घई ने कहा कि इसे लेकर हाल ही में उनके संबंध में प्रकाशित समाचारों के संदर्भ में कुछ तथ्य स्पष्ट किया।उन्होंने आज एक रिलीज जारी कर कहा कि टाट वाले बाबा एवं डमरूवाले बाबा मंदिर के मध्य स्थित भूमि वर्षों से उपेक्षा के कारण जंगल का रूप ले चुकी है। इस उपेक्षा के चलते वहां नशे का अवैध व्यापार, असामाजिक तत्वों की गतिविधियाँ तथा अन्य गैरकानूनी कृत्य पनपते रहे हैं। जिसकी जानकारी क्षेत्र के नागरिकों एवं प्रशासन को समय-समय पर दी जाती रही है।काशीपुर डेवलपमेंट फोरम (केडीएफ) द्वारा अपनी स्वयं की भूमि पर बच्चों को तीर-कमान (धनुर्विद्या) का प्रशिक्षण पूर्णतः निःस्वार्थ भाव से दिया जा रहा है। यह प्रशिक्षण द्रोण सागर की पौराणिक परंपरा से जुड़ा है, बच्चों में अनुशासन, संस्कृति और खेल भावना विकसित करता है और इसके परिणामस्वरूप कई बच्चों ने राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं में पुरस्कार प्राप्त कर काशीपुर का नाम रोशन किया है।केडीएफ पार्क में सीमित भूमि उपलब्ध होने के कारण, इन बच्चों के अभिभावकों द्वारा प्रशासन से यह मांग की गई कि द्रोण सागर से लगी जंगल बनी भूमि को
अवैध गतिविधियों से मुक्त कर
तीरअंदाजी जैसे पारंपरिक, अनुशासित और सकारात्मक खेल के लिए विकसित किया जाए।यह मांग न तो किसी धार्मिक स्थल के विरुद्ध है न ही किसी प्रकार का व्यावसायीकरण है, बल्कि यह बच्चों के भविष्य, संस्कृति के संरक्षण और समाज को नशे से बचाने की दिशा में एक सकारात्मक प्रयास है।इसके बावजूद, डमरूवाले बाबा मंदिर समिति से जुड़े कुछ स्वयंभू पदाधिकारियों द्वारा इसका विरोध किया जा रहा है, जबकि उनके द्वारा मंदिर परिसर पर नाजायज कब्ज़े, उच्च न्यायालय के आदेशों की भावना के विपरीत गतिविधियाँ तथा भक्तों की आस्था से जुड़े संसाधनों के दुरुपयोग जैसे आरोप लंबे समय से चर्चा में रहे हैं। उन्होंने कहा कि मामले की निष्पक्ष जांच का वह पूर्ण समर्थन करते हैं।उन्होंने लोगों से अफवाहों से दूर रहने की अपील की।




