उद्भव में दिखी राष्ट्र की दिशा तय करने की सोच
पंतनगर।जब युवा प्रश्नों से बचते नहीं, बल्कि उन्हें समझने और तर्क के साथ सामने रखने का साहस करते हैं, तब समाज में केवल संवाद नहीं होता—विवेक जन्म लेता है। यही विवेक आगे चलकर राष्ट्र की दिशा तय करता है। इसी विचारशील वातावरण का सजीव अनुभव आज गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय में हुई राष्ट्रीय अंतर-विश्वविद्यालय वाद-विवाद प्रतियोगिता – उद्भव में दिखा। देश के 42 विश्वविद्यालयों से आए विद्यार्थियों प्रतिभागियों ने अपने विचार प्रस्तुत किए। “डिजिटल अर्थव्यवस्था भारतीय युवाओं की वास्तविक आवश्यकताओं की पूर्ति करने में पूर्णतः सक्षम है।” विषय पर आयोजित वाद विवाद प्रतियोगिता में राजेंद्र चड्ढा, प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य; सरदार गजेंद्र सिंह, नैनीताल उच्च न्यायालय के सरकारी अधिवक्ता; डॉ. हरमेश चौहान, सेमैप के पूर्व मुख्य वैज्ञानिक एवं 1980 बैच के पूर्व छात्र; तथा जगदीश कुमार आदि शामिल हुए। अंग्रेज़ी वाद–विवाद का मूल्यांकन बोहितेश मिश्रा, सह-संस्थापक एवं निखिलेश शांडिल्य, टीक्यूएम प्रबंधक, अशोक लेलैंड, द्वारा किया गया। वहीं हिंदी वाद–विवाद का मूल्यांकन विशंभर नाथ तिवारी, प्रख्यात पत्रकार वर्ष 2011 में इसी वाद–विवाद प्रतियोगिता के पूर्व विजेता, एवं मुख्य प्रौद्योगिकी अधिकारी, एवेक्सा सिस्टम्स प्रा. लि., विवेक विसेन, प्रबंध निदेशक, प्लास्टो इंडस्ट्रीज़ द्वारा किया गया।डॉ. एसके. कश्यप, मेंटर, विवेकानंद स्वाध्याय मण्डल, ने कहा कि यह वाद–विवाद केवल एक औपचारिक प्रतियोगिता नहीं, बल्कि ऐसा विचार-मंच है, जो युवाओं से अपेक्षा करता है कि वे अपनी ऊर्जा, विवेक और चिंतन को दिशा देकर सार्थक, प्रभावशाली और भविष्यनिर्माणकारी संवाद प्रस्तुत करें। उन्होंने कहा कि इस वर्ष की थीम युवाओं को समकालीन यथार्थ को उजागर करने के साथ-साथ व्यावहारिक और दूरदर्शी समाधान प्रस्तुत करने के व्यापक अवसर प्रदान करती है, जो एक उज्ज्वल और सशक्त भविष्य की नींव रख सकते हैं। उद्भव के राष्ट्रीय समन्वयक शांभवी एवं स्निग्ध अवस्थी ने कहा कि उद्भव जैसे मंच, जो पिछले 19 वर्षों से निरंतर सक्रिय हैं और आने वाले वर्षों में भी अपनी यात्रा जारी रखेंगे, श्रोताओं को एक सार्थक अवसर प्रदान करते हैं।
विष्णु सक्सेना, संस्थापक एवं प्रबंध निदेशक, इंडक्वा इंजीनियर्स एंड कंसल्टेंट्स ने कहा कि वाद-विवाद केवल तर्क-वितर्क करने का कौशल बनकर नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे जीवन में अपनाया जाना चाहिए और यह व्यक्ति के आचरण और संस्कृति का हिस्सा बन जाना चाहिए।राजू गाभा, संस्थापक, स्माइल फैक्ट्री ने बहस के संदर्भ में कहा कि शिक्षा का उपहार सबसे बड़ा उपहार है, क्योंकि यह मंच विचारों को आकार देता है और समाज और राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य की नींव रखता है।यह आयोजन केवल प्रतिस्पर्धा का मंच नहीं बना, बल्कि ऐसा संवादात्मक वातावरण तैयार हुआ, जहां प्रश्नों को सुना गया, समझा गया और अलग-अलग दृष्टियों से परखा गया। पक्ष में अपने विचार प्रस्तुत करते हुए प्रतिभागियों ने कहा कि भारत तीव्र गति से डिजिटल महाशक्ति बनने की दिशा में अग्रसर है। उन्होंने अपने तर्कों के समर्थन में कई ठोस आंकड़े और तथ्य प्रस्तुत किए। प्रतिभागियों के अनुसार, भारत का डिजिटल व्यापार लगभग 402 अरब अमेरिकी डॉलर का हो चुका है और डिजिटल सुविधाओं के क्षेत्र में भारत विश्व में तीसरे स्थान पर है। डेटा खपत के मामले में भारत विश्व का अग्रणी देश है, जबकि राष्ट्रीय आय में डिजिटल अर्थव्यवस्था का योगदान लगभग 15 प्रतिशत है। इसके अतिरिक्त, भारत सूचना प्रौद्योगिकी सेवाओं के निर्यात में विश्व में दूसरे स्थान पर है और देश में 4.3 मिलियन किलोमीटर का विशाल ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क स्थापित किया जा चुका है। ग्रामीण भारत में भी डिजिटल पहुँच का विस्तार हो रहा है, जहाँ 16 प्रतिशत ग्रामीण युवा इंटरनेट का उपयोग कर रहे हैं। युवाओं में डिजिटल अपनापन स्पष्ट रूप से दिखाई देता है—लगभग 90 प्रतिशत युवा यूपीआई उपयोगकर्ता हैं, 60 प्रतिशत युवा इंटरनेट के माध्यम से संवाद करते हैं, और एक वर्ष में शिक्षा क्षेत्र से जुड़े युवाओं की संख्या में 179 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।प्रतिभागियों ने यह भी रेखांकित किया कि भारत की डिजिटल प्रगति में सरकारी नीतियों और पहलों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
इन तथ्यों के आधार पर प्रतिभागियों ने निष्कर्ष निकाला कि भारत न केवल डिजिटल परिवर्तन को आत्मसात कर रहा है, बल्कि वैश्विक डिजिटल नेतृत्व की ओर भी सशक्त कदम बढ़ा रहा है। दूसरी ओर, विपक्ष ने भी अपने तर्क इस प्रकार प्रस्तुत किए कि डिजिटल माध्यमों के अनुचित उपयोग के कारण युवाओं में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएँ बढ़ रही हैं। उनके अनुसार, युवाओं में अवसाद (डिप्रेशन) के मामलों में लगभग 35 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 2023 में 93 लाख साइबर अपराध के मामले सामने आए, जबकि एम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार युवाओं में स्क्रीन एडिक्शन में 350 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है। विपक्ष ने यह भी कहा कि 1.46 अरब की आबादी को एक ही चरण में डिजिटल प्रणाली की जटिलताओं की ओर ले जाना व्यावहारिक नहीं है। इसके अतिरिक्त, देश के कई क्षेत्रों में इंटरनेट सुविधाओं की अपर्याप्त उपलब्धता और अस्थिर इंटरनेट गति एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। उन्होंने यह भी इंगित किया कि उपयोग हो रहे डिजिटल डेटा का एक बड़ा हिस्सा अउत्पादक स्रोतों पर व्यय हो रहा है, जबकि डिजिटल साक्षरता का स्तर अभी भी कम है।वैश्विक परिदृश्य में इंटरनेट गति के मामले में भारत 111वें स्थान पर है, जो डिजिटल अवसंरचना की सीमाओं को दर्शाता है। इसके साथ ही, देश में डिजिटल विभाजन की समस्या गहराती जा रही है—कई क्षेत्रों में स्मार्टफोन की उपलब्धता अभी भी सीमित है। विशेष रूप से ग्रामीण महिलाएं इस डिजिटल परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित हो रही हैं, जहां कम साक्षरता और सीमित संसाधन डिजिटल समावेशन की राह में बाधा बन रहे हैं।
पक्ष और विपक्ष—दोनों ही ओर से प्रस्तुत तर्कों ने विषय की गहराई और जटिलता को सामने रखा। बहस के दौरान यह देखने को मिला कि प्रतिभागी केवल किसी एक दृष्टिकोण पर अटके नहीं रहे, बल्कि एक-दूसरे के तर्कों को सुनते हुए अपने विचारों को और परिष्कृत करते गए।




