ऊधम सिंह नगर

रोशनी की एक किरण,दिमाग के रहस्यों का खुला राज

ऑप्टोजेनेटिक्स: रोशनी से मस्तिष्क के रहस्यों को खोलने वाली तकनीक

डॉ. संतोष श्रीवास्तव

काशीपुर। (लोक निर्णय)विज्ञान में कभी-कभी ऐसी खोज होती है जो किसी बीमारी का नया इलाज भर नहीं देती, बल्कि मानव शरीर को समझने का हमारा तरीका ही बदल देती है। ऑप्टोजेनेटिक्स (Optogenetics) ऐसी ही तकनीक है। इसी क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान के लिए 2026 का शरीर क्रिया विज्ञान या चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार कार्ल डाइसेरोथ (Karl Deisseroth), पीटर हेगेमैन (Peter Hegemann) और जॉर्ज नागेल (Georg Nagel) को संयुक्त रूप से प्रदान किया गया है। नोबेल सम्मान ने उस तकनीक को वैश्विक पहचान दी है, जिसने वैज्ञानिकों को जीवित मस्तिष्क की चुनिंदा तंत्रिका कोशिकाओं को प्रकाश की मदद से सक्रिय या निष्क्रिय करने की क्षमता दी।

आखिर ऑप्टोजेनेटिक्स है क्या?

हमारे मस्तिष्क में अरबों न्यूरॉन्स एक अत्यंत जटिल नेटवर्क के रूप में काम करते हैं। स्मृति, भय, प्रसन्नता, दर्द, नींद, भूख, नशे की लत और हमारे व्यवहार तक—इन सबके पीछे अलग-अलग न्यूरल सर्किट सक्रिय रहते हैं। लंबे समय तक वैज्ञानिक मस्तिष्क की गतिविधि को रिकॉर्ड तो कर सकते थे, लेकिन किसी विशिष्ट प्रकार के न्यूरॉन को मिलीसेकंड के स्तर पर चालू या बंद करके यह देखना कि उससे व्यवहार में क्या परिवर्तन आता है, बेहद कठिन था।

ऑप्टोजेनेटिक्स ने इसी समस्या का समाधान किया। इसमें आनुवंशिकी (genetics) और प्रकाश (optics) को एक साथ प्रयोग किया जाता है। चुनिंदा कोशिकाओं में प्रकाश के प्रति संवेदनशील प्रोटीन बनाने वाला जीन डाला जाता है। इसके बाद उपयुक्त तरंगदैर्ध्य का प्रकाश देने पर इन कोशिकाओं की विद्युत गतिविधि को नियंत्रित किया जा सकता है। इसीलिए इसे सरल भाषा में “न्यूरॉन्स का लाइट-स्विच” कहा जा सकता है।

एक साधारण शैवाल से मस्तिष्क तक

इस क्रांतिकारी तकनीक की कहानी विशेष रूप से रोचक है। इसका आधार एककोशिकीय हरे शैवाल Chlamydomonas में पाए जाने वाले प्रकाश-संवेदी प्रोटीनों के अध्ययन से तैयार हुआ। पीटर हेगेमैन और जॉर्ज नागेल के शोध ने Channelrhodopsin जैसे light-gated ion channels की क्षमता को सामने रखा। प्रकाश पड़ते ही ये चैनल खुलते हैं और कोशिका झिल्ली के आर-पार आयनों का प्रवाह बदल जाता है।

इसके बाद कार्ल डाइसेरोथ और उनके सहयोगियों ने इस सिद्धांत को न्यूरोसाइंस में शक्तिशाली उपकरण के रूप में विकसित किया। 2005 के महत्वपूर्ण प्रयोगों ने दिखाया कि प्रकाश-संवेदी प्रोटीन को न्यूरॉन्स में व्यक्त कराकर प्रकाश के माध्यम से उनकी firing को अत्यंत सटीकता से नियंत्रित किया जा सकता है। यहीं से आधुनिक ऑप्टोजेनेटिक्स ने तेजी से आकार लिया।

मस्तिष्क पर मानो एक अत्यंत सूक्ष्म रिमोट कंट्रोल

इस तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता उसकी spatial और temporal precision है। वैज्ञानिक पहले आनुवंशिक तकनीक से तय कर सकते हैं कि किस प्रकार के न्यूरॉन्स प्रकाश के प्रति संवेदनशील होंगे। फिर प्रकाश की छोटी-सी pulse देकर उन कोशिकाओं को सक्रिय अथवा शांत किया जा सकता है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि वैज्ञानिक किसी व्यक्ति के पूरे मस्तिष्क या विचारों को “रिमोट कंट्रोल” से चला सकते हैं। वास्तविक वैज्ञानिक उपलब्धि कहीं अधिक सूक्ष्म है—यह पता लगाया जा सकता है कि किस neural circuit की सक्रियता किस शारीरिक क्रिया, भावना या व्यवहार के लिए आवश्यक है। इससे neuroscience में केवल correlation देखने के बजाय cause-and-effect की जांच करना संभव हुआ है।

चिकित्सा में इसकी संभावनाएं

ऑप्टोजेनेटिक्स अभी मुख्यतः एक अत्यंत शक्तिशाली research tool है; इसे सामान्य मरीजों के लिए उपलब्ध स्थापित उपचार समझना सही नहीं होगा। फिर भी इसके जरिए Parkinson’s disease, epilepsy, dementia, addiction और विभिन्न psychiatric तथा neurological disorders से जुड़े neural circuits को समझने में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है।

एक और रोमांचक दिशा दृष्टि की पुनर्स्थापना है। वैज्ञानिक retinal cells को प्रकाश-संवेदी बनाने के विचार पर काम कर रहे हैं, विशेषकर उन स्थितियों में जहां photoreceptors नष्ट हो चुके हों। इसी प्रकार भविष्य में hearing restoration और अन्य neural prostheses में भी प्रकाश आधारित तकनीकों की भूमिका की संभावनाएं खोजी जा रही हैं।

लेकिन मानव मस्तिष्क में इसका चिकित्सीय उपयोग आसान नहीं है। इसके लिए संबंधित कोशिकाओं तक सही जीन सुरक्षित रूप से पहुंचाना, मस्तिष्क के भीतर पर्याप्त प्रकाश पहुंचाना, दीर्घकालिक सुरक्षा सुनिश्चित करना और immune response जैसी समस्याओं का समाधान करना आवश्यक है। इसलिए प्रयोगशाला में इसकी असाधारण सफलता और नियमित clinical treatment के बीच अभी महत्वपूर्ण दूरी है।

इस नोबेल पुरस्कार का असली संदेश

2026 का चिकित्सा नोबेल हमें विज्ञान की एक खूबसूरत विशेषता भी याद दिलाता है—बड़ी चिकित्सा क्रांतियां हमेशा अस्पताल से शुरू नहीं होतीं। कभी-कभी एक वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश करता है कि एक सूक्ष्म शैवाल प्रकाश की ओर क्यों तैरता है, और वर्षों बाद उसी मूलभूत जिज्ञासा से ऐसी तकनीक जन्म लेती है जो मानव मस्तिष्क के सबसे जटिल रहस्यों को खोलने लगती है।

ऑप्टोजेनेटिक्स ने हमें मस्तिष्क को केवल “देखने” से आगे बढ़ाकर उसके विशिष्ट neural circuits को नियंत्रित करके उनके कार्य को समझने का साधन दिया है। शायद भविष्य में यही ज्ञान neurological और psychiatric diseases के अधिक सटीक उपचार की नींव बने।

एक छोटे से शैवाल में प्रकाश को पहचानने वाले प्रोटीन से शुरू हुई यात्रा आज उस मुकाम तक पहुंच गई है, जहां वैज्ञानिक प्रकाश की एक किरण से चुनिंदा न्यूरॉन्स की गतिविधि बदल सकते हैं। यही ऑप्टोजेनेटिक्स की खूबसूरती है—प्रकाश के माध्यम से मस्तिष्क के अंधेरे रहस्यों को समझने का विज्ञान।

locnirnay@gmail.com

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