दुर्लभ तस्वीरें बयां कर रहीं विवि की स्वर्णिम इतिहास संग उपलब्धियां
पंतनगर।शिक्षा,शोध और प्रसार की त्रिवेणी को पंतनगर कृषि विवि की स्थापना 17 नवंबर,1960 को हुई थी।उस समय देश खाद्यान्न के संकट से जूझ रहा था।तराई जंगलों से भरी हुई थी, ऐसे में यहां के वैज्ञानिकों के साथ इलिनॉय विवि अमेरिका के वैज्ञानिकों ने भी काम किया। वैज्ञानिकों के दिन रात की मेहनत की बदौलत देश में वर्ष,1966_77 में हरित क्रांति आई। हरित क्रांति में सोनालिका और कल्याण सोना नाम की गेहूं बौनी प्रजाति की अहम भूमिका रही और रिकॉर्ड तोड़ उत्पादन हुआ था।यह दोनों प्रजाति ई नॉर्मन बोरलॉग ने अंतरराष्ट्रीय गेहूं एवं मक्का शोध केंद्र मैक्सिको में विकसित की थी।
वर्ष, 1949 में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की अध्यक्षता वाले विश्विद्यालय शिक्षा आयोग ने स्पष्ट दिशा दी थी कि “देश में ग्रामीण (कृषि) विश्वविद्यालय की आवश्यकता है, जो कृषि शिक्षा भी दे और कृषि शोध भी करे ।” इस अनुरूप पहली बार शिक्षण, शोध, प्रसार की त्रिवेणी को लेकर कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। पंतनगर देश का पहला कृषि विश्वविद्यालय बना। 16 हजार एकड़ पर स्थापित होने वाले लैंड ग्रांट पद्धति के इस विश्वविद्यालय की कहानी देश के कृषि विकास और खाद्यान्न आत्मनिर्भरता की कहानी है । प्रथम सन्तति के कर्मठ और दूरदर्शी वैज्ञानिकों और शिक्षकों ने जिस तरह खेतों में रात-दिन मेहनत कर इस विश्वविद्यालय को पहचान दिलाई, वह अविस्मरणीय है। डॉ. वाईएल नेने, डॉ. एमसी सक्सेना, डॉ. अनंतराव, डॉ. पालीवाल, डॉ. ढानढा जैसे सैंकड़ों वैज्ञानिकों के साथ इलिनॉय यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों की टीम भी 10 वर्ष यहां रही।जिसका नेतृत्व डॉ. लैंबर्ट्स ने किया। देश के कृषि विकास के उस स्वर्णिम काल की सारी स्मृतियां समय के साथ पुरानी पड़ती गईं कि कितने संघर्ष और मेहनत से यह पंतनगर यूनिवर्सिटी बनी। तब कृषि महाविद्यालय के पूर्व अधिष्ठाता डॉ. शिवेन्द्र कुमार कश्यप ने विश्वविद्यालय के इतिहास और उपलब्धियों पर गहन अध्ययन कर वर्ष,2003 में ही फाइव डिकेड्स ऑफ पंतनगर जैसा महत्वपूर्ण ग्रन्थ बनाया था ।जिसका विमोचन स्वयं तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने किया था। इस ग्रन्थ के माध्यम से तब तक के सारे दीक्षा समारोह के भाषण एक साथ एकत्र हो पाए और सारे पुराने वैज्ञानिकों के संस्मरण को एक साथ बांधा जा सका। ये भारत के कृषि विकास के इतिहास को बांधने जैसा महत्वपूर्ण और कठिन काम था। न पुरानी तस्वीरें एक जगह थी, न ही पुराने दस्तावेज। हज़ारों पेजों के दुर्लभ दस्तावेज और तस्वीरें दुनिया के कोने-कोने से इकट्ठे कर ये ग्रन्थ बना और पंतनगर के स्वर्णिम इतिहास को प्रतिष्ठा मिली। तब से वर्ष,2018 तक डॉ. कश्यप के मन में पंतनगर के एक संग्रहालय के स्थापना का सपना बना रहा।
जिससे हर नया विद्यार्थी, अतिथि और सारी दुनिया इस विश्वविद्यालय के स्वर्णिम इतिहास और उपलब्धियों का दर्शन कर पाएं। ग्रन्थ के प्रकाशन के 15 वर्षों के बाद उन्हें नाहेप परियोजना के रूप में एक अवसर मिला और पंतनगर संग्रहालय की स्थापना हुई। जिसमें उस स्वर्णिम अतीत की सारी यादें एक भव्य स्वरूप में सदा-सर्वदा के लिए स्थापित हो गई। देश भर के प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, नीतिकारों ने पंतनगर संग्रहालय के विजिटर बुक में लिखा है कि “आप देश के अनेक संग्रहालय देखेंगे पर यह विश्वविद्यालय संग्रहालय इसलिए विशिष्ट है कि इसे केवल शब्दों और तस्वीरों से नहीं, पंतनगर के प्रति बहुत गहरे प्यार और श्रद्धा से बनाया गया है । इसकी हर तस्वीर, हर शब्द, हर कोना अपनेपन और आत्मीयता से भरा है। यहां आकर एक खास अनुभूति होती है। जैसे किसी तीर्थस्थल पर जाकर होती है ।” डॉ. कश्यप की विश्वविद्यालय को यह देन देश में अनूठी और अद्भुत है।जिसका महत्व समय के साथ बढ़ता रहेगा । स्थापना दिवस पर यह समझना जरूरी है कि पंतनगर केवल विश्वविद्यालय नहीं है, ये पिछले 65 वर्षों में पंतनगर से जुड़े शिक्षकों और छात्रों का पंतनगर से गहरा लगाव है, जो वे मरते दम तक जीते हैं, ये देश के कृषि विकास की कहानी का पहला अध्याय है, जो हमेशा पहला ही रहेगा।पंतनगर देश के कृषि विश्वविद्यालयों का बड़ा भाई है।जिसका यह स्थान सदा इसके पास संरक्षित है।इस समय देश में करीब 72 कृषि विवि हैं। हैं।





