वैज्ञानिक रेशम उत्पादन, शहतूत की खेती का प्रशिक्षण
देहरादून। (लोक निर्णय)कार्यक्रम का समन्वयन डॉ. साक्षी वैष्णव, वैज्ञानिक-बी एवं प्रशिक्षण समन्वयक तथा डॉ. अरसाकुमार ई., वैज्ञानिक-बी ने केंद्र प्रमुख डॉ. पवन सैनी, वैज्ञानिक-डी के मार्गदर्शन में किया। कार्यक्रम का शुभारंभ प्रतिभागियों के पंजीकरण और प्रशिक्षण किट वितरण के साथ हुआ।पांच दिवसीय प्रशिक्षण के दौरान रेशमकीट प्रजनन के सिद्धांत एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण, रेशम उत्पादन का परिचय, शहतूत की खेती एवं रोपण प्रबंधन, रेशमकीट पालन की वैज्ञानिक विधियाँ, गुणवत्तापूर्ण रेशमकीट बीज उत्पादन, मूल बीज फार्मों की भूमिका तथा रेशमकीट बीज उत्पादन की उन्नत तकनीकों पर व्याख्यान आयोजित किए गए। इसके अतिरिक्त, रेशमकीट पालन गृहों एवं उपकरणों के विसंक्रमण, रेशमकीट और शहतूत की बीमारियों की पहचान, निदान एवं प्रबंधन, एकीकृत कृषि प्रणाली में रेशम उत्पादन की भूमिका तथा कोया गुणवत्ता के मूल्यांकन संबंधी तकनीकी जानकारी प्रदान की गई।कार्यक्रम में केंद्रीय रेशम बोर्ड के सेवानिवृत्त वैज्ञानिक डॉ. आबाद अहमद सिद्दीकी सहित बोर्ड की विभिन्न इकाइयों में कार्यरत वैज्ञानिकों एवं केंद्र प्रभारियों ने संसाधन व्यक्तियों के रूप में सहभागिता की। इनमें डॉ. विक्रम कुमार, वैज्ञानिक-सी एवं प्रभारी, पी-3 मूल बीज फार्म, माजरा; डॉ. प्रशांत जे., वैज्ञानिक-बी एवं प्रभारी, रेशमकीट बीज उत्पादन केंद्र, मीठीबेरी, प्रेमनगर; श्री अभिषेक सिंह, वैज्ञानिक-सी एवं प्रभारी, पी-2 मूल बीज फार्म, शीशमबाड़ा; तथा श्री राहुल पाल, वैज्ञानिक-बी (रीलिंग एवं स्पिनिंग) एवं प्रभारी, रेशम तकनीकी सेवा केंद्र, प्रेमनगर, देहरादून शामिल थे। क्षेत्रीय रेशम उत्पादन अनुसंधान केंद्र, जम्मू की वैज्ञानिक-बी डॉ. रुबिया बुखारी ने भी अतिथि वक्ता के रूप में विशेषज्ञ व्याख्यान प्रस्तुत किया।विशेषज्ञों ने अनुसंधान अनुभव, वैज्ञानिक ज्ञान और क्षेत्रीय स्तर पर अर्जित व्यावहारिक अनुभव प्रतिभागियों के साथ साझा किए। इससे विद्यार्थियों को रेशम उत्पादन के क्षेत्र में अनुसंधान, नवाचार और व्यावसायिक संभावनाओं को समझने का अवसर मिला। वहीं, रेशम निदेशालय के कर्मचारियों को उन्नत तकनीकों के प्रभावी क्रियान्वयन, क्षेत्रीय समस्याओं के वैज्ञानिक समाधान तथा किसानों तक नवीन तकनीकों के प्रसार के संबंध में मार्गदर्शन प्राप्त हुआ।कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों को रेशम संग्रहालय का शैक्षणिक भ्रमण कराया गया। साथ ही, कोया शिल्प निर्माण, रेशमकीट पालन गृहों एवं उपकरणों के विसंक्रमण, शहतूत पौधरोपण एवं रखरखाव, कोया नमूनाकरण, सुखाने, छँटाई एवं श्रेणीकरण तथा रेशमकीट बीज उत्पादन की विभिन्न प्रक्रियाओं का व्यावहारिक प्रशिक्षण एवं प्रदर्शन किया गया।प्रतिभागियों ने केंद्रीय रेशम बोर्ड और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) रुड़की के संयुक्त अनुसंधान एवं तकनीकी सहयोग से स्थापित आदर्श एवं वहनीय रेशमकीट पालन गृह का भी भ्रमण किया। इस दौरान उन्होंने नियंत्रित तापमान एवं आर्द्रता की परिस्थितियों में संचालित पछेती शरदकालीन रेशमकीट पालन की गतिविधियों और प्रगति का प्रत्यक्ष अवलोकन किया। उन्हें आधुनिक पालन गृह की संरचना, संचालन प्रणाली, पर्यावरणीय नियंत्रण व्यवस्था तथा वैज्ञानिक प्रबंधन पद्धतियों की जानकारी भी दी गई।सैद्धांतिक व्याख्यानों, व्यावहारिक प्रशिक्षण सत्रों और तकनीकी भ्रमणों के समन्वित आयोजन से प्रतिभागियों को शहतूत की खेती से लेकर रेशमकीट पालन, कोया उत्पादन और रेशम रीलिंग तक की संपूर्ण उत्पादन शृंखला की व्यापक जानकारी प्राप्त हुई। प्रशिक्षण के अंतिम दिवस प्रतिभागियों से कार्यक्रम के संबंध में प्रतिक्रिया प्राप्त की गई तथा अर्जित ज्ञान एवं तकनीकों के क्षेत्रीय स्तर पर प्रभावी अनुप्रयोग की संभावनाओं पर चर्चा की गई। समापन सत्र में प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र एवं स्मृति-चिह्न वितरित किए गए और कार्यक्रम की स्मृति में समूह छायाचित्र लिया गया।





