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डिजिटल चक्रव्यूह में उलझती युवा पीढ़ी: सोशल मीडिया की चमक-दमक का कड़वा सच

संजय माथुर, प्रोफेसर इलेक्ट्रॉनिक्स एवं कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग, प्रौद्योगिकी महाविद्यालय , गोविन्द बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय पंतनगर

पंतनगर।(लोक निर्णय)भारत में डिजिटल क्रांति और सस्ते डेटा की सुलभता ने समाज के हर वर्ग को इंटरनेट से जोड़ दिया है। 100 करोड़ (1 अरब) से अधिक इंटरनेट उपयोगकर्ताओं और 50 करोड़ से ज्यादा सक्रिय इंटरनेट मीडिया यूज़र्स के साथ भारत दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल बाजार बन चुका है। लेकिन इस डिजिटल क्षितिज पर एक गहरा संकट भी मंडरा रहा है। इंटरनेट मीडिया, जो कभी अभिव्यक्ति और रचनात्मकता का सशक्त माध्यम माना जाता था।अब भारतीय बच्चों और युवाओं के लिए एक ऐसा चक्रव्यूह बनता जा रहा है जिसमें वे अपनी शिक्षा, स्वास्थ्य और भविष्य को दांव पर लगा रहे हैं।

जनरेशन ज़ेड, मिलेनियल्स और उनकी डिजिटल परवरिश

इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए भारत की युवा जनसांख्यिकी की संरचना को समझना आवश्यक है। सोशल मीडिया का सबसे बड़ा हिस्सा दो प्रमुख पीढ़ियों से आता है:

1.     मिलेनियल्स (जनरेशन वाई) : वर्ष 1981 से 1996 के बीच जन्मे लोग (वर्तमान आयु लगभग 30 से 45 वर्ष)। यह वह पीढ़ी है जिसने अपने बचपन में पारंपरिक और एनालॉग दुनिया देखी और अपनी युवावस्था में कंप्यूटर और इंटरनेट के आगमन को अपनाया।

2.     जनरेशन ज़ेड (जेन ज़ी) : वर्ष 1997 से 2012 के बीच जन्मे लोग (वर्तमान आयु लगभग 14 से 29 वर्ष)। यह इतिहास की पहली ‘डिजिटल नेटिव’ (Digital Native) पीढ़ी है, जिसका जन्म और पालन-पोषण सीधे स्मार्टफोन, हाई-स्पीड इंटरनेट और सोशल मीडिया के युग में हुआ है।

जहां मिलेनियल्स ने तकनीक को एक साधन या उपकरण के रूप में अपनाया, वहीं जनरेशन ज़ेड के लिए डिजिटल दुनिया उनकी जीवनशैली का अभिन्न अंग बन चुकी है। बचपन से ही हाथ में टचस्क्रीन, ऑनलाइन गेमिंग और निरंतर इंटरनेट कनेक्टिविटी के माहौल में पले-बढ़े होने के कारण इन युवाओं में वास्तविक दुनिया के सामाजिक संबंधों से ज्यादा आभासी (ऑनलाइन) पहचान को महत्व देने की प्रवृत्ति विकसित हुई है। इसी पृष्ठभूमि ने उन्हें सोशल मीडिया के आकर्षण और इसके दुष्परिणामों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बना दिया है।

शॉर्ट-वीडियो और ‘अटेंशन इकोनॉमी’ की अंधी दौड़

भारतीय यूजर्स का लगभग 65 प्रतिशत समय अब 60 सेकंड से छोटे वीडियो (रील्स और शॉर्ट्स) देखने में बीत रहा है। इंटरनेट मीडिया पर एक औसत भारतीय दैनिक रूप से लगभग 2 घंटे 28 मिनट बिताता है, जबकि किशोरों में यह आंकड़ा 5 से 7 घंटे तक पहुँच जाता है।इंटरनेट मीडिया पर कुल अपलोड होने वाले कंटेंट में लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा केवल मनोरंजन, कॉमेडी, लिप-सिंक और नाच-गाने से जुड़ा है। ‘अटेंशन इकोनॉमी’ के इस युग में व्यूज, लाइक्स और फॉलोअर्स पाने की अंधी होड़ ने क्रिएटर्स को उत्तेजक और सजेस्टिव कंटेंट बनाने के लिए मजबूर कर दिया है। सार्वजनिक स्थानों पर अमर्यादित आचरण, द्विअर्थी संवाद और भ्रामक थंबनेल के सहारे रातों-रात वायरल होने का शॉर्टकट अपनाया जा रहा है। यह प्रवृत्ति न केवल नैतिक मूल्यों का ह्रास कर रही है, बल्कि वास्तविक प्रतिभा और मूल्यवान विषय-सामग्री को भी पीछे धकेल रही है।

पढ़ाई में पिछड़ापन और करियर का नुकसान

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चिंताजनक पक्ष स्कूली शिक्षा पर पड़ रहा प्रभाव है। अध्ययनों के अनुसार, भारत में लगभग 36.9 प्रतिशत छात्र गंभीर रूप से डिजिटल लत (स्क्रीन एडिक्शन) का शिकार हैं। छोटे-छोटे वीडियो लगातार देखने से युवाओं की एकाग्रता अवधि (अटेंशन स्पैन) घटकर कुछ ही सेकंड रह गई है। वे 15 मिनट भी ध्यान केंद्रित करके पढ़ाई नहीं कर पाते।’इन्फ्लुएंसर’ बनने और डिजिटल शोहरत पाने के चक्कर में कई छात्र कोचिंग और स्कूल की कक्षाएं छोड़ रहे हैं। बोर्ड परीक्षाओं में असफलता या अंक गिरने के बाद, कई युवा हताशा में आकर पढ़ाई पूरी तरह छोड़ (ड्रॉपआउट कर) देते हैं। डिजिटल क्रिएटर अर्थव्यवस्था की कड़वी सच्चाई यह है कि इसमें केवल शीर्ष 1 से 2 प्रतिशत लोग ही स्थायी आय अर्जित कर पाते हैं। बिना किसी शैक्षणिक डिग्री या न्यूनतम योग्यता के, जब एल्गोरिदम बदलने से इन युवाओं की लोकप्रियता गिरती है, तो उनके पास नौकरी के बाजार में कोई विकल्प (प्लान-बी) नहीं बचता।

मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा पर संकट

लाइक्स और कमेंट्स से मिलने वाला डोपामाइन रश युवाओं को मानसिक रूप से अस्थिर बना रहा है। जब किसी वीडियो पर व्यूज नहीं आते, तो छात्र तीव्र निराशा, हीन भावना और एंग्जायटी का शिकार हो जाते हैं। 22-23 साल की उम्र में जब उनके साथी डिग्री हासिल कर कॉर्पोरेट जगत में आगे बढ़ते हैं, तब पढ़ाई छोड़ चुके ये युवा गहरे अवसाद में चले जाते हैं।इसके अतिरिक्त, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के दुरुपयोग से बने डीपफेक वीडियो और फर्जी खबरों ने साइबर बुलिंग तथा ब्लैकमेलिंग के मामलों में भारी बढ़ोतरी की है। सोशल मीडिया पर लगभग 70 प्रतिशत पुरुष यूजर होने के कारण युवा महिला क्रिएटर्स को अक्सर ऑनलाइन ट्रोलिंग और अभद्र टिप्पणियों का सामना करना पड़ता है।

कानूनी प्रावधान और भावी राह

इंटरनेट पर अश्लील या भ्रामक सामग्री प्रसारित करने पर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 292 और सूचना प्रौद्योगिकी कानून (आईटी एक्ट) की धारा 67 के तहत सख्त सजा का प्रावधान है। सरकार और प्लेटफॉर्म्स अपने स्तर पर नीतिगत प्रयास कर रहे हैं, लेकिन इस सामाजिक संकट का समाधान केवल कानूनों से संभव नहीं है।हमें अपने शैक्षणिक संस्थानों और परिवारों में ‘डिजिटल हाइजीन’ को अनिवार्य बनाना होगा। बच्चों को यह समझाना अत्यंत आवश्यक है कि कंटेंट क्रिएशन को स्कूली शिक्षा की कीमत पर नहीं, बल्कि एक सीमित शौक के रूप में ही अपनाया जाना चाहिए। अभिभावकों को 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के स्क्रीन टाइम और उनके द्वारा अपलोड की जा रही सामग्री पर सतर्क दृष्टि रखनी होगी।भारत की जनसांख्यिकीय लाभांश (डेमोग्राफिक डिविडेंड) ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। यदि हमने समय रहते अपनी युवा पीढ़ी को इस आभासी चक्रव्यूह से बाहर निकालकर वास्तविक ज्ञान, कौशल और मूल्यों की ओर नहीं मोड़ा, तो देश को इसका बहुत बड़ा सामाजिक और आर्थिक मूल्य चुकाना पड़ सकता है।

locnirnay@gmail.com

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