करोना काल में जब सांसों पर संकट था, तब एसईसीएल बनी थी जीवनदायिनी
अरविंद कुमार सिंह,मुख्य संपादक
कोरबा। (लोक निर्णय)कोरोना काल में जब लोग घरों में कैद हो गए थे, कोविड के संक्रमण से प्रभावित लोग अस्पतालों में जिंदगी और मौत के बीच जूझ थे,तब भी प्राकृतिक सौंदर्य,लोककला, खनिज संपदा से समृद्ध छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले की एसईसीएल का उत्पादन बंद नहीं रहा।अधिकारी और कर्मचारी प्लांट में कार्य करने के लिए पूरी हिम्मत और जज्बा के साथ जुटे रहे हैं। लोग ड्यूटी से भाग नहीं रहे थे,बल्कि वारियर बनकर कोयले की खदानों से अस्पतालों तक जीवन की डोर थाम रखे थे।इसकी वजह कोई भी उत्पाद या ऑक्सीजन उत्पादन के लिए बिजली की जरूरत पड़ती है।बिजली उत्पादन के लिए कोयले की जरूरत पड़ती है।इसलिए कोयले की खदान में कोयला उत्पादन कर बिजली उत्पादन करने वाले प्लांट को सप्लाई की जाती थी।जिससे जरूरतमंद मरीजों को आक्सीजन की कमी न पड़ सके। यदि बिजली उत्पादन ठप हो जाता तो देश दुनिया में कोरोना के साथ ही दूसरा संकट खड़ा हो सकता था।यह कहने में अतिश्योक्ति नहीं होगी कि कोरोना काल में एसईसीएल जीवनदायनी के रूप में काम कर रहा था।कोयले की खदानों में उत्पादन नहीं रुका।यहीं नहीं,उत्पादन के साथ ही वायु प्रदूषण संरक्षण के लिए मियावाकी वन विकसित भी की है।सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार के अंतर्गत पीआइबी देहरादून की ओर मीडिया दल 15 सितंबर को साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (एसईसीएल) की गेवरा ओपनकास्ट कोयला खदान का भ्रमण किया।कोयला खदानों में विकास की एक ऐसी तस्वीर देखी, जिसमें उत्पादन के साथ सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण को भी प्राथमिकता दी जा रही है। कोयला उत्पादन के साथ ही एसईसीएल हरियाली की भी नई कहानी लिख रहा है।
पत्रकारों ने कोयला निकालने से लेकर ओवरबर्डन हटाने, कोयले की हैंडलिंग और परिवहन तक की पूरी प्रक्रिया की जानकारी दी गई। उच्च क्षमता वाली आधुनिक मशीनरी, शॉवेल-डंपर संयोजन, सरफेस माइनर और रिपर तकनीक के साथ खनन की निगरानी और संचालन में डिजिटल तकनीक के इस्तेमाल की बारीकियों को करीब से देखा।एसईसीएल के महाप्रबंधक क्षेत्रीय संजय कुमार मिश्रा ने कहा कि देश के विकास और ऊर्जा जरूरतों में कोयले की महत्वपूर्ण भूमिका है। खाना पकाने के ईंधन से लेकर उद्योगों और विभिन्न ऊर्जा जरूरतों तक कोयला लंबे समय से महत्वपूर्ण स्रोत रहा है। उन्होंने कहा कि कंपनी उत्पादन के साथ श्रमिकों की सुरक्षा, सामाजिक दायित्व और पर्यावरणीय संरक्षण को भी महत्व दे रही है। कोरोना काल में कोयले की खदान बंद नहीं रही।अधिकारियों और कर्मचारियों योद्धा की तरह ड्यूटी निभाई। यदि बिजली उत्पादन नहीं होता तो देश दुनिया में दूसरा संकट खड़ा हो जाता।महाप्रबंधक (ऑपरेशंस) धीरज चौधरी ने पत्रकारों को गेवरा खदान के संचालन, उत्पादन क्षमता और सुरक्षा प्रोटोकॉल की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि गेवरा दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी और एशिया की नंबर वन ओपनकास्ट कोयला खदान है। वर्ष 2023-24 में यहां करीब 59.1 मिलियन टन कोयले का उत्पादन हुआ। खदान से देश के सात राज्यों को कोयले की आपूर्ति होती है और यह भारत के कुल कोयला उत्पादन में करीब छह प्रतिशत का योगदान देती है।बताया कि पर्यावरण संरक्षण के लिए वनीकरण, मियावाकी पौधरोपण, धूल नियंत्रण, खदान के पानी का प्रबंधन और भूमि पुनर्वास शामिल हैं। मियावाकी पौधारोपण तकनीक के तहत करीब दो हेक्टेयर क्षेत्र में 20 हजार पौधे लगाए गए हैं और इनका सर्वाइवल रेट करीब 70 प्रतिशत बताया गया। कम भूमि में सघन वन तैयार करने वाली यह तकनीक उत्तराखंड जैसे सीमित भू-भाग वाले राज्य के लिए उपयोगी साबित हो सकती है।अधिकारियों ने बताया कि ट्रैफिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए रिंग रोड का प्रस्ताव है।जिसकी लंबाई करीब 25 किलोमीटर है।इस मामले में प्रदेश सरकार से बातचीत चल रही है। अधिकारियों ने बताया कि भविष्य में कोयले की खदान बंद होने को ध्यान में रखकर कार्ययोजना तैयार की जा रही है।इस मामले में बनाई गई समिति के अध्यक्ष जिले के कलेक्टर है। जिनकी जमीन अधिग्रहण किया जाता है,उन्हें उचित मुआवजा दिया जाता है।यदि दो हेक्टर जमीन किसी का अधिग्रहण किया जाता है तो उनके परिवार के एक सदस्य को परमानेंट नौकरी दी जाती है। सुनियोजित तरीके से पुनर्वास किया जाता है।टूर के संचालन अधिकारी पीआइबी देहरादून के सहायक निदेशक संजीव सुंद्रियाल ने कहा कि छत्तीसगढ़ में विकास, ऊर्जा, सुरक्षा और पर्यावरणीय प्रबंधन के इस मॉडल का अध्ययन उत्तराखंड के लिए भी लाभकारी सिद्ध होगा।





